जब सिसक उठे सितारे

मुंबई के आतंकी हमलों से यंू तो पूरा देश सकते में रहा, लेकिन बॉलीवुड के सितारे जैसे सिसक उठे। कहते भी हैं, कलाकार ज्यादा संवेदनशील होता है। यही वजह है कि बॉलीवुड की कई नामचीन हस्तियों के दिल रो उठे और उन्होंने अपने ब्लॉख्स पर भावुक अभिव्यक्ति दी। कमलेश माहेश्वरी ने शहीदों को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए चुने सेलिब्रिटीज की पीड़ा बांटने वाले कुछ खास ब्लॉख्स, पत्र और साक्षात्कार।

कैसे जाऊं अपनों को छोड़ -अमिताभ बच्चन

आतंकी हमले की मार झेलते मेरे मासूम, कमजोर और पूरी तरह से असुरक्षित देशवासियों को इस गंभीर दशा में देखकर मेरी पीड़ा उभर आई है। मैं उन अयोख्य शासकों से बेहद खफा हूं, जिन्हें हम सबकी देखभाल व सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया है। पिछली रात जैसे ही ये सारे आतंकी हमले मेरी आंखों के सामने होते नजर आए। जब मैं सोने के लिए तैयार हुआ, तो मैंने अपनी पाइंट 32 बोर की लाइसेंस वाली रिवाल्वर निकाली और उसे अपने तकिए के पास रख लिया। यह मेरी बेचैन नींद के लिए जरूरी था। सिरहाने रिवाल्वर रखने की बात को मीडिया ने सही ढंग से नहीं, बल्कि तोड़-मरोड़कर अपने ढंग से पेश किया। यह वक्त इस तरह की बातें उठाने का नहीं है। मेरी पीड़ा और गुस्सा बरकरार है। मुझे इस समय हांगकांग में होना चाहिए था, अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने अपने खास कार्यक्रम में मुझे भाषण देने बुलाया था। पर, मैं नहीं गया। मैं संकट के इन पलों में अपने देश को छोड़कर कैसे जा सकता हूं। मैंने अगले हफ्ते के भी सारे कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं। मैं कहीं भी नाचने, गाने या चैरिटी चंदा जमा करने नहीं जाऊंगा, जबकि मेरा देश, मेरा शहर लहूलुहान है।

मैं तीन सौ बार रोई-लता मंगेशकर

मुंबई की त्रासदी पर शब्दों में अपनी भावनाएं व्यक्त करने में मुश्किल हो रही है। मैं जिंदगी में इतनी ज्यादा विचलित कभी नहीं रही। मैं पिछले तीन दिनों से लगातार टीवी देख रही हूं और करीबन 300 बार रोई। मुझे ऎसी पूर्व सूचना थी कि गुजरात और दिल्ली के बाद मुंबई भी आतंककारियों के निशाने पर है। मैंने परिवारजनों के साथ इस विषय पर बात भी की थी। पर, यह कभी नहीं सोचा था कि इतना सब कुछ इतनी जल्दी हो जाएगा। मुझे नहीं लगता कि दहशतगर्दो का यह आखिरी हमला होगा। हमें बहुत ज्यादा सावधान और तैयार रहना होगा। हेमंत करकरे को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानती थी और जब आज वे जिंदा नहीं हैं, तो मुझे उनकी मौजूदगी अपने आसपास लग रही है। जब मैंने टीवी चैनलों पर शहीदों की अंतिम यात्रा के दौरान “ऎ मेरे वतन के लोगों” गाना बजते सुना, तो मेरे दिल में वही दर्द उभर आया, जो मैंने इसे गाते वक्त महसूस किया था। मुझे यकीन है कि हम भारतीयों में किसी भी परिस्थिति से मुकाबला करने की हिम्मत है और हम ऎसा कर दिखाएंगे।

बिना मजहब के दहशतगर्द -आमिर खान

मैं कल से सिर्फ टीवी देख रहा हूं और देख रहा हूं कि कैसे मुंबई के कई इलाके जंग के मैदान बन गए हैं। मैं दिल दहला देने वाले मंजर देख रहा हूं। ताज में लगी आग को देखकर मैं बहुत बेचैन हो गया। ऎसा महसूस हुआ कि मैं अंदर से बीमार हो गया हूं। मुझे उनकी बड़ी फिक्र है जो ताज के अंदर फंस गए हैं। उन पर पता नहीं क्या बीत रही होगी। बचावकर्मी पूरे जज्बे और हिम्मत के साथ जुटे हुए हैं, पर मेरी कल्पना थोड़ी वहशी हो चली है। मुझे आग में अपने-अपने कमरों में फंसे मजबूर लोग दिख रहे हैं। मैं इस विपदा में मारे गए और बंधक बना लिए गए लोगों के परिवारों के लिए दिल से संवेदना पेश करता हूं। खासकर हेमंत करकरे जैसे मुंबई के जांबाजों के लिए, जो कई राजनीतिक दलों के निशाने पर भी थे। मैं पूछता हूं, कब इन नेताओं को समझ आएगा और ये मानेंगे कि किसी आतंकवादी का कोई मजहब नहीं होता। वह हिंदू, मुसलमान, सिख या ईसाई नहीं होता। उसका न तो कोई मजहब होता है और न ही कोई खुदा। वह तो दिमागीतौर पर खराब इंसान होता है और वैसे ही खराब काम करता है। मैं दुआ करता हूं कि हमारी सेना और एनएसजी के जांबाज जल्द से जल्द इस खौफनाक मंजर को खत्म कर हालात पर काबू पा लें।

मैं जिंदगी जीना चाहता हूं अनुपम खेर

जब कभी मुंबई पर कोई विपदा आती है, तो सीधे-सीधे मेरी आत्मा पर चोट पहुंचती है। चाहे 1993 के सीरियल बम ब्लास्ट हो, मुंबई में भयंकर बाढ़ आई हो, टे्रन में बम धमाके हुए हों या मुंबई पर और कोई आफत आई हो, हर बार मेरी आत्मा को ठेस पहुंची है। लेकिन इस बार मुट्ठीभर दहशतगर्दो ने साठ घंटे तक मुंबई में दहशत का खेल खेलकर मेरी रूह को दहला दिया है। हालांकि यह सब लिखते समय मैं अपने शहर से हजारों मील दूर साउथ अफ्रीका में हूं और खुद को संभालने की कोशिश कर रहा हूं। हर हिंदुस्तानी की तरह मैं भी बेचैन और नाराज हूं। मेरा विश्वास है कि हालात चाहे जैसे भी हों, जिंदगी को लेकर अपना नजरिया कभी नहीं बदलना चाहिए। मुझे एक नए विश्वास के साथ जीना ही होगा, वरना मैं जीते जी मर जाऊंगा। पिछले सत्ताइस साल में मुंबई से मैंने जो कुछ भी सीखा है, वही इस संकट की घड़ी में मेरा संबल है। मुझे एक बार फिर से अपने सपने संजोने होंगे और जीना होगा। अगर मैंने ऎसा नहीं किया, तो उन शहीदों की शहादत की बेकद्री होगी, जिन्होंनेे हमारे सुनहरे कल की खातिर खुद को बलिदान कर दिया। मैं जिंदगी जीना चाहता हूं, बिताना नहीं।

उम्मीद चाहिए, बापू चाहिए -शेखर कपूर

न्यूयॉर्क में अपने होटल के कमरे में बैठकर मैं समझने की कोशिश ही कर रहा था कि आखिर हो क्या रहा है! मैं इंटरनेट देखने लगा। कुछ ही देर में सब कुछ खत्म हो गया। अब मैं सीएनएन चैनल देख रहा हूं और देख रहा हूं कि लड़ाई अभी भी जारी है! और मुझे उन लोगों की मौत पर लिखी खबरें मिल रही हैं, जो मेरे या मेरे दोस्तों के करीबी थे। कैसे एक छोटा सा समूह भारत की सेना और मुंबई की पुलिस को मजबूर कर सकता है और क्यों इतने लोग आसपास यह देखने के लिए घूम रहे हैं कि हो क्या रहा है यह पूरी तरह से अजीब लेकिन दुखद वाकया है। मेरी आंखों में आंसू भर आए हैं क्योंकि मैं अपने देश को शहीदों को सलाम करते देख रहा हूं। पर मैं लिख रहा हूं। मैं गुस्से से भरा हूं और ऎसी दशा में मैं अकेला नहीं हंू। मेरा मुंबई से ज्यादा पक्का रिश्ता नहीं हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि मेरा गुस्सा कम हो जाएगा। मुझे लगता है कि हम एक महान देश के सक्षम नागरिक हैं, लेकिन पिछले दो दिन की घटनाओं ने मेरे विचारों को बदल दिया है। मैं सोच रहा हूं कि इतने क्षमतावान लोग होने के बावजूद हम कैसे उन लोगों को अपने पर शासन करने दे सकते हैं, जो बेहद अक्षम हैं। भारत में बदलाव किसी गृहमंत्री के इस्तीफे से या खबरिया चैनलों पर हाई प्रोफाइल लोगों की दिमागपच्ची से नहीं आने वाला है। इस बदलाव के लिए उम्मीद चाहिए और उसके लिए चाहिए एक और महात्मा गांधी।

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